दुष्यन्त कुमार कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय

ई- 115/ 21 शिवाजी नगर भोपाल 462016

सम्पर्क : 76920 26871 , 83193 79126

यह संस्था साहित्यकारों के सहयोग से चलने वाली पूर्णत: गैर सरकारी संस्था है । इस संस्था को सरकार द्वारा शासकीय भवन आवंटित किया गया है जहां संग्रहालय संचालित है। संस्था को आवंटित इस भवन में साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन निरंतर होते रहता है।

संस्था साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन तो करती ही है । मूल रूप से दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय का उद्देश्य है साहित्य पूर्वजों की धरोहर को संग्रहित करके सुरक्षित रखना और पर्यटकों शोधार्थियों और विद्यार्थियों को शोध और अध्ययन के लिए उपलब्ध कराना।

प्रसिद्ध कविताएँ

मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ 

मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ 
वो ग़ज़ल आप को सुनाता हूँ 
एक जंगल है तेरी आँखों में 
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ 
तू किसी रेल सी गुज़रती है 
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ 
हर तरफ़ एतराज़ होता है 
मैं अगर रौशनी में आता हूँ 
एक बाज़ू उखड़ गया जब से 
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ 
मैं तुझे भूलने की कोशिश में 
आज कितने क़रीब पाता हूँ 
कौन ये फ़ासला निभाएगा 
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ 

ये ज़बाँ हम से सी नहीं जाती

ये ज़बाँ हम से सी नहीं जाती
ज़िंदगी है कि जी नहीं जाती
इन फ़सीलों में वो दराड़ें हैं
जिन में बस कर नमी नहीं जाती
देखिए उस तरफ़ उजाला है
जिस तरफ़ रौशनी नहीं जाती
शाम कुछ पेड़ गिर गए वर्ना
बाम तक चाँदनी नहीं जाती
एक आदत सी बन गई है तू
और आदत कभी नहीं जाती
मय-कशो मय ज़रूरी है लेकिन
इतनी कड़वी कि पी नहीं जाती
मुझ को ईसा बना दिया तुम ने
अब शिकायत भी की नहीं जाती

वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है

वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है 
माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है 
वे कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तुगू 
मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है 
सामान कुछ नहीं है फटे-हाल है मगर 
झोले में उस के पास कोई संविधान है 
उस सर-फिरे को यूँ नहीं बहला सकेंगे आप 
वो आदमी नया है मगर सावधान है 
फिस्ले जो उस जगह तो लुढ़कते चले गए 
हम को पता नहीं था कि इतना ढलान है 
देखे हैं हम ने दौर कई अब ख़बर नहीं 
पावँ तले ज़मीन है या आसमान है 
वो आदमी मिला था मुझे उस की बात से 
ऐसा लगा कि वो भी बहुत बे-ज़बान है